दीवार कहाँ बोलती है कुछ
बस सहती रहती है ....
कीलों और हथौडों के वार से
होती रहती है ज़ख्मी
बार बार,लगातार
वो अपने ज़ख्म दिखाए भी तो किसे
ज़ख्म देने वाले उसके अपने ही तो हैं
वो ही.जिन्होंने बनाया है उस दीवार को
बदलते है लोग और
बदलता जाता है दीवार का रंग भी
सजती और रंगती रहती है
उसके खरीदार की पसंद से
काश कोई हो जो
झाँक सके उसकी दरारों के परे..
Saturday, May 10, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
4 comments:
bejubaan ko jubaan dena to aapki kalam hi janti hai,bahut hi badhiya badhai.
aajkal aap nazmo pe hath aazma rahi hai ,achha lagta hai......gulzar ki aisi hi ek nazm hai.....jee chahta hai jhanke ke dekhu is falak ke par kya koi doosri falak bhi hai.......
काश!!!!
बहुत गहरी रचना है, बधाई इस भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए.
-----------------------------------
आप हिन्दी में लिखती हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं, इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.
एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.
यह एक अभियान है. इस संदेश को अधिकाधिक प्रसार देकर आप भी इस अभियान का हिस्सा बनें.
शुभकामनाऐं.
समीर लाल
(उड़न तश्तरी)
nice poem carrying deep meaning....
Post a Comment