Monday, May 5, 2008

कहाँ हो तुम

कहाँ हो तुम
एक बार तो आ जाओ

तुम्हारा इंतज़ार करते करते
वक़्त वहीं रुक गया है
जहाँ तुम इसे छोड़ कर गयीं थीं
थक कर बैठ गया है
दीवार से टेक लगाये
तुम आओ तो ये वक़्त भी चले....

याद है वो पूनम की रात
मैंने चांदनी भर भर कर
उलीची थी तुम पर
पूरी छत रंग गयी थी चांदनी से
वो रंग नहीं उतरा है आज तक
तुम आओ तो ये रंग उतरे....

कुछ वादों,कुछ शिकवों
कुछ लम्हों से बुना एक रिश्ता
तन्हाई की सर्द रातों से जमा हुआ
पड़ा है घर की ताक पर
तुम आओ तो ये रिश्ता पिघले...

बरसों से
मेरी पलकों पर
ठहरा हुआ है एक आंसू का कतरा
थक चुकी हैं पलकें
इसका बोझ उठाते उठाते
तुम आओ तो ये बोझा उतरे...

कहाँ हो तुम
एक बार तो आ जाओ

6 comments:

mehek said...

intaazar ka khubsurat vivaranmbahut badhai

Keerti Vaidya said...

title padh kar he a janey kanah kho gayi aur kavita aur bhi badyia hai...

khush rahey..

आलोक said...

इन्तज़ार, प्रतीक्षा। बाद में यही लगता है न कि क्यों की? कविता ही समझा सकती है यह अन्तर्द्वन्द्व।

डॉ .अनुराग said...

जहाँ तुम इसे छोड़ कर गयीं थीं
थक कर बैठ गया है
दीवार से टेक लगाये
तुम आओ तो ये वक़्त भी चले....

ये दिल को छू गई....सम्वेंदना समेटे.....अपने भीतर कितना मुश्किल है जीना.....?

Dr. Chandra Kumar Jain said...

वक़्त जैसे रुक-सा गया पढ़ते-पढ़ते !
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बधाई.

tarun said...

Dil ko chhoo gayee ye nazm aapki ..


-tarun