dear...
अगर मैं तेरा आसमान नही
तो कोई बात नही
मुझे अपनी ज़मीन बनाकर
अपने पैर टिका ले
भले ही आसमान को तू छू न सके
तेरे पैरों की ज़मी हिलने नही दूंगी
तुझे डगमगाने नही दूंगी
ये वादा है मेरा....
अगर मैं तेरी मंजिल नही
तो कोई बात नही
मुझे अपना रास्ता ही बना ले
हर कदम तेरे साथ चलूंगी
तेरी हमसफ़र बनकर और
तेरी मंजिल से तुझे मिलाने से पहले
तेरा साथ नही छोडूंगी
ये वादा है मेरा....
अगर मैं तेरे जीवन की रौशनी नही
तो कोई बात नही
मुझे अपनी जिंदगी की स्याही बना ले
खुली आंखों से रौशनी में जी ले
जब आँखें थक कर बंद होंगी
तो तू अकेला नही होगा
मैं ही मैं दिखूंगी तुझे
ये वादा है मेरा....
अगर मैं तेरी खुशी नही
तो कोई बात नही
आंसू का कतरा बनाकर
पलकों में छुपा ले
जब खुशी तुझसे रूठेगी
तब तेरे सारे ग़मों को साथ ले
मैं बह निकलूँगी
ये वादा है मेरा.....
Wednesday, June 11, 2008
Monday, May 26, 2008
मुझे तुमसे मोहब्बत है..
जिस दिन से वो आई मेरी जिंदगी में
उजाला बन कर छा गयी
सुबह की चाय में घुला उसका प्यार
मिठास से भर देता मेरे मन को
जब निकलने लगता ऑफिस को
तो दौड़कर आती और
कानों में बुदबुदा जाती
मैं आपसे प्रेम करती हूं
मैं हौले से मुस्कुरा देता
कपकपाती सर्दी में उसके हाथ का स्वेटर
बदन को ही नहीं मन को भी
प्रेम की ऊष्मा से भर देता
हर शाम हलके हाथों से मेरे माथे को सहलाती और
धीरे से बुदबुदाती
मुझे आपसे बहुत प्रेम है
मैं हौले से उसका गाल थपथपा देता
लेकिन हमेशा उसकी आँखों में नज़र आती
अनजानी सी बेचैनी,अनजानी सी प्यास
पचपन साल वो साए की तरह
मेरे साथ चली
कल वो चली गयी इस दुनिया से
मेरे सामने था उसका बेजान शरीर
ठंडे बर्फ से सर्द हाथ
और अधखुली आँखें,जिनमे थी
वोही प्यास,वो ही बेचैनी
मैं रो पड़ा फूट फूट कर
थाम कर उसके सर्द हाथ
मैं बुदबुदाया उसके कानों में
मुझे तुमसे बेहद मोहब्बत है
अगले ही पल मैंने देखा
बंद हो गयी उसकी अधखुली आँखें
लगता है उसकी बरसों की प्यास बुझी
उसके जाने के बाद........
उजाला बन कर छा गयी
सुबह की चाय में घुला उसका प्यार
मिठास से भर देता मेरे मन को
जब निकलने लगता ऑफिस को
तो दौड़कर आती और
कानों में बुदबुदा जाती
मैं आपसे प्रेम करती हूं
मैं हौले से मुस्कुरा देता
कपकपाती सर्दी में उसके हाथ का स्वेटर
बदन को ही नहीं मन को भी
प्रेम की ऊष्मा से भर देता
हर शाम हलके हाथों से मेरे माथे को सहलाती और
धीरे से बुदबुदाती
मुझे आपसे बहुत प्रेम है
मैं हौले से उसका गाल थपथपा देता
लेकिन हमेशा उसकी आँखों में नज़र आती
अनजानी सी बेचैनी,अनजानी सी प्यास
पचपन साल वो साए की तरह
मेरे साथ चली
कल वो चली गयी इस दुनिया से
मेरे सामने था उसका बेजान शरीर
ठंडे बर्फ से सर्द हाथ
और अधखुली आँखें,जिनमे थी
वोही प्यास,वो ही बेचैनी
मैं रो पड़ा फूट फूट कर
थाम कर उसके सर्द हाथ
मैं बुदबुदाया उसके कानों में
मुझे तुमसे बेहद मोहब्बत है
अगले ही पल मैंने देखा
बंद हो गयी उसकी अधखुली आँखें
लगता है उसकी बरसों की प्यास बुझी
उसके जाने के बाद........
Monday, May 19, 2008
आखिरी मुलाकातें
जेहन से जाती ही नहीं
वो भीगी शाम
छलक उठी थी तुम्हारे
अश्कों में डूबकर
याद है मुझे तुम्हारी ठंडी छुअन
जिसके एहसास से मैं
आज भी सिहर उठता हूँ
तुम्हारा चेहरा...
जैसे किसी ने दर्द लाकर मल दिया हों
सीना तो मेरा भी फट गया था
पर मर्द था न... आंसू जज्ब कर गया था
मेरे सीने से लगी तुम और
उफ़,तुम्हारी वो सिसकियाँ
सीधे दिल में उतर रही थीं
पूरे पहर खामोश थे हम
और शाम गीली हों रही थी
अरसा बीत गया...
पर मांजी की वो भीगी शाम
खिंची चली आई है
मेरे आज का सिरा पकड़कर
यूं तो जिस्म सूखा है पर
रूह तो आज तक भीगी हुई है
शायद आखिरी मुलाकातें ऐसी ही होती हैं....
वो भीगी शाम
छलक उठी थी तुम्हारे
अश्कों में डूबकर
याद है मुझे तुम्हारी ठंडी छुअन
जिसके एहसास से मैं
आज भी सिहर उठता हूँ
तुम्हारा चेहरा...
जैसे किसी ने दर्द लाकर मल दिया हों
सीना तो मेरा भी फट गया था
पर मर्द था न... आंसू जज्ब कर गया था
मेरे सीने से लगी तुम और
उफ़,तुम्हारी वो सिसकियाँ
सीधे दिल में उतर रही थीं
पूरे पहर खामोश थे हम
और शाम गीली हों रही थी
अरसा बीत गया...
पर मांजी की वो भीगी शाम
खिंची चली आई है
मेरे आज का सिरा पकड़कर
यूं तो जिस्म सूखा है पर
रूह तो आज तक भीगी हुई है
शायद आखिरी मुलाकातें ऐसी ही होती हैं....
Tuesday, May 13, 2008
कुछ अनकही....
याद है मुझे आज भी वो
तुमसे पहली बार मिलना
कुछ कहना चाहा था तुमसे
पर होंठ काम्पकर रह गए
लफ्ज़ जुबां तक आये और
होंठों से फिसल गए....
आज भी वो लफ्ज़
कॉलेज की सीढियों के पास पड़े हैं..
हम बार बार मिले और
हर बार होठों का काम्पना,
लफ्जों का जुबां तक आना और
फिसल कर गिर जाना चलता रहा.....
गंगा के तट पर ,घर में सोफे के पीछे,
library में ,बरिस्ता में
और तुम्हे अपनी bike पर ले जाते हुए
शहर के सभी रास्तों पर
आज भी वो लफ्ज़ बिखरे पड़े हैं...
पर कल जब तुम्हे देखा
कई बरसों के बाद तो
पहली बार झाँककर देखा
तुम्हारी आँखों की गहराई में
तुम्हारी आँखों ने मेरी आँखों से कहा...
न समझ सके तुम मेरी जुबां
जरा ध्यान से देखो
अपने फिसले हुए लफ्जों को
हर लफ्ज़ तुम्हे जोड़ी में मिलेगा
एक तुम्हारा...एक मेरा....
तुमसे पहली बार मिलना
कुछ कहना चाहा था तुमसे
पर होंठ काम्पकर रह गए
लफ्ज़ जुबां तक आये और
होंठों से फिसल गए....
आज भी वो लफ्ज़
कॉलेज की सीढियों के पास पड़े हैं..
हम बार बार मिले और
हर बार होठों का काम्पना,
लफ्जों का जुबां तक आना और
फिसल कर गिर जाना चलता रहा.....
गंगा के तट पर ,घर में सोफे के पीछे,
library में ,बरिस्ता में
और तुम्हे अपनी bike पर ले जाते हुए
शहर के सभी रास्तों पर
आज भी वो लफ्ज़ बिखरे पड़े हैं...
पर कल जब तुम्हे देखा
कई बरसों के बाद तो
पहली बार झाँककर देखा
तुम्हारी आँखों की गहराई में
तुम्हारी आँखों ने मेरी आँखों से कहा...
न समझ सके तुम मेरी जुबां
जरा ध्यान से देखो
अपने फिसले हुए लफ्जों को
हर लफ्ज़ तुम्हे जोड़ी में मिलेगा
एक तुम्हारा...एक मेरा....
Saturday, May 10, 2008
दीवार
दीवार कहाँ बोलती है कुछ
बस सहती रहती है ....
कीलों और हथौडों के वार से
होती रहती है ज़ख्मी
बार बार,लगातार
वो अपने ज़ख्म दिखाए भी तो किसे
ज़ख्म देने वाले उसके अपने ही तो हैं
वो ही.जिन्होंने बनाया है उस दीवार को
बदलते है लोग और
बदलता जाता है दीवार का रंग भी
सजती और रंगती रहती है
उसके खरीदार की पसंद से
काश कोई हो जो
झाँक सके उसकी दरारों के परे..
बस सहती रहती है ....
कीलों और हथौडों के वार से
होती रहती है ज़ख्मी
बार बार,लगातार
वो अपने ज़ख्म दिखाए भी तो किसे
ज़ख्म देने वाले उसके अपने ही तो हैं
वो ही.जिन्होंने बनाया है उस दीवार को
बदलते है लोग और
बदलता जाता है दीवार का रंग भी
सजती और रंगती रहती है
उसके खरीदार की पसंद से
काश कोई हो जो
झाँक सके उसकी दरारों के परे..
Monday, May 5, 2008
कहाँ हो तुम
कहाँ हो तुम
एक बार तो आ जाओ
तुम्हारा इंतज़ार करते करते
वक़्त वहीं रुक गया है
जहाँ तुम इसे छोड़ कर गयीं थीं
थक कर बैठ गया है
दीवार से टेक लगाये
तुम आओ तो ये वक़्त भी चले....
याद है वो पूनम की रात
मैंने चांदनी भर भर कर
उलीची थी तुम पर
पूरी छत रंग गयी थी चांदनी से
वो रंग नहीं उतरा है आज तक
तुम आओ तो ये रंग उतरे....
कुछ वादों,कुछ शिकवों
कुछ लम्हों से बुना एक रिश्ता
तन्हाई की सर्द रातों से जमा हुआ
पड़ा है घर की ताक पर
तुम आओ तो ये रिश्ता पिघले...
बरसों से
मेरी पलकों पर
ठहरा हुआ है एक आंसू का कतरा
थक चुकी हैं पलकें
इसका बोझ उठाते उठाते
तुम आओ तो ये बोझा उतरे...
कहाँ हो तुम
एक बार तो आ जाओ
एक बार तो आ जाओ
तुम्हारा इंतज़ार करते करते
वक़्त वहीं रुक गया है
जहाँ तुम इसे छोड़ कर गयीं थीं
थक कर बैठ गया है
दीवार से टेक लगाये
तुम आओ तो ये वक़्त भी चले....
याद है वो पूनम की रात
मैंने चांदनी भर भर कर
उलीची थी तुम पर
पूरी छत रंग गयी थी चांदनी से
वो रंग नहीं उतरा है आज तक
तुम आओ तो ये रंग उतरे....
कुछ वादों,कुछ शिकवों
कुछ लम्हों से बुना एक रिश्ता
तन्हाई की सर्द रातों से जमा हुआ
पड़ा है घर की ताक पर
तुम आओ तो ये रिश्ता पिघले...
बरसों से
मेरी पलकों पर
ठहरा हुआ है एक आंसू का कतरा
थक चुकी हैं पलकें
इसका बोझ उठाते उठाते
तुम आओ तो ये बोझा उतरे...
कहाँ हो तुम
एक बार तो आ जाओ
Saturday, May 3, 2008
आँखों में सहेज कर रखा है
देखा नहीं कई सालों से तुझे
कोई ख़त भी तो नहीं आया तेरा
न कभी महफ़िल में तेरा ज़िक्र आया
कहाँ होगी,कैसी होगी तू
क्या अब भी पूनम के चाँद को तू देखती है
क्या अब भी आगे चलने वाले की चप्पल दबाना
और फिर अनजान बनकर इधर उधर देखना
और फिर पागलों की तरह हँसना
अच्छा लगता है तुझे..
क्या अब भी कांच की शीशियों में
जुगनू बंद करती हो...
क्या अब भी मैं तुझे याद आता हूँ...?
याद है...तूने एक बार कहा था
मैं तुम्हारी आँखों में सपने की तरह रहूंगी
मैंने आज तक तुझे आँखों में सहेज कर रखा है
एक आंसू भी छलकने नहीं दिया
कहीं आंसुओं के साथ मेरा ख्वाब भी न छलक जाए...
कोई ख़त भी तो नहीं आया तेरा
न कभी महफ़िल में तेरा ज़िक्र आया
कहाँ होगी,कैसी होगी तू
क्या अब भी पूनम के चाँद को तू देखती है
क्या अब भी आगे चलने वाले की चप्पल दबाना
और फिर अनजान बनकर इधर उधर देखना
और फिर पागलों की तरह हँसना
अच्छा लगता है तुझे..
क्या अब भी कांच की शीशियों में
जुगनू बंद करती हो...
क्या अब भी मैं तुझे याद आता हूँ...?
याद है...तूने एक बार कहा था
मैं तुम्हारी आँखों में सपने की तरह रहूंगी
मैंने आज तक तुझे आँखों में सहेज कर रखा है
एक आंसू भी छलकने नहीं दिया
कहीं आंसुओं के साथ मेरा ख्वाब भी न छलक जाए...
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