जिस दिन से वो आई मेरी जिंदगी में
उजाला बन कर छा गयी
सुबह की चाय में घुला उसका प्यार
मिठास से भर देता मेरे मन को
जब निकलने लगता ऑफिस को
तो दौड़कर आती और
कानों में बुदबुदा जाती
मैं आपसे प्रेम करती हूं
मैं हौले से मुस्कुरा देता
कपकपाती सर्दी में उसके हाथ का स्वेटर
बदन को ही नहीं मन को भी
प्रेम की ऊष्मा से भर देता
हर शाम हलके हाथों से मेरे माथे को सहलाती और
धीरे से बुदबुदाती
मुझे आपसे बहुत प्रेम है
मैं हौले से उसका गाल थपथपा देता
लेकिन हमेशा उसकी आँखों में नज़र आती
अनजानी सी बेचैनी,अनजानी सी प्यास
पचपन साल वो साए की तरह
मेरे साथ चली
कल वो चली गयी इस दुनिया से
मेरे सामने था उसका बेजान शरीर
ठंडे बर्फ से सर्द हाथ
और अधखुली आँखें,जिनमे थी
वोही प्यास,वो ही बेचैनी
मैं रो पड़ा फूट फूट कर
थाम कर उसके सर्द हाथ
मैं बुदबुदाया उसके कानों में
मुझे तुमसे बेहद मोहब्बत है
अगले ही पल मैंने देखा
बंद हो गयी उसकी अधखुली आँखें
लगता है उसकी बरसों की प्यास बुझी
उसके जाने के बाद........
Monday, May 26, 2008
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7 comments:
aakhir ki kuchh lines kamal ki hain
पल्लवी जी
भावुक कर दिया कविता ने। बस यही तो सच्ची मोहब्बत है। उनकी स्मृति सदा आपके जीवन को महकाती रहे ।
dard alfazon me kaise bayan karte hain.
unko dekh ke laga, wo saanso se bhi kaha karte hain..
बहुत भावपूर्ण एवं भावुक कविता है. एक कहानी पढ़ी थी इन्हीं विचारों से मेल खाती, आज याद आ गई.
अच्छा लगा ये कुछ अलग अंदाज है.....पर कही न कही ऐसा लगता है असली पल्लवी इसी मे छिपी है.....
तेरे पैरों की ज़मी हिलने नही दूंगी
तुझे डगमगाने नही दूंगी
ये वादा है मेरा....भावुक कविता है.
are vha Palavii ji jis rachana ko padh rhe hai vahi sundar lag rhi hai.
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