Monday, May 19, 2008

आखिरी मुलाकातें

जेहन से जाती ही नहीं
वो भीगी शाम
छलक उठी थी तुम्हारे
अश्कों में डूबकर

याद है मुझे तुम्हारी ठंडी छुअन
जिसके एहसास से मैं
आज भी सिहर उठता हूँ
तुम्हारा चेहरा...
जैसे किसी ने दर्द लाकर मल दिया हों
सीना तो मेरा भी फट गया था
पर मर्द था न... आंसू जज्ब कर गया था

मेरे सीने से लगी तुम और
उफ़,तुम्हारी वो सिसकियाँ
सीधे दिल में उतर रही थीं
पूरे पहर खामोश थे हम
और शाम गीली हों रही थी

अरसा बीत गया...
पर मांजी की वो भीगी शाम
खिंची चली आई है
मेरे आज का सिरा पकड़कर
यूं तो जिस्म सूखा है पर
रूह तो आज तक भीगी हुई है

शायद आखिरी मुलाकातें ऐसी ही होती हैं....

9 comments:

Udan Tashtari said...

अति सुन्दर भावाव्यक्ति. बधाई.

ghughutibasuti said...

बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती

अजित वडनेरकर said...

सुंदर कविता , सुंदर अभिव्यक्ति ।

mehek said...

behad sundar

डॉ .अनुराग said...

रूह तो आज तक भीगी हुई है

सच कहा.....

mamta said...

सुंदर !

Sanjeet Tripathi said...

सुंदर!
बहुत बढ़िया!

Abhishek Ojha said...

यूं तो जिस्म सूखा है पर
रूह तो आज तक भीगी हुई है.

ऐसा क्यों लग रहा है की ऐसा सबके साथ होता है?

Advocate Rashmi saurana said...

kya baat hai. ati uttam.