जेहन से जाती ही नहीं
वो भीगी शाम
छलक उठी थी तुम्हारे
अश्कों में डूबकर
याद है मुझे तुम्हारी ठंडी छुअन
जिसके एहसास से मैं
आज भी सिहर उठता हूँ
तुम्हारा चेहरा...
जैसे किसी ने दर्द लाकर मल दिया हों
सीना तो मेरा भी फट गया था
पर मर्द था न... आंसू जज्ब कर गया था
मेरे सीने से लगी तुम और
उफ़,तुम्हारी वो सिसकियाँ
सीधे दिल में उतर रही थीं
पूरे पहर खामोश थे हम
और शाम गीली हों रही थी
अरसा बीत गया...
पर मांजी की वो भीगी शाम
खिंची चली आई है
मेरे आज का सिरा पकड़कर
यूं तो जिस्म सूखा है पर
रूह तो आज तक भीगी हुई है
शायद आखिरी मुलाकातें ऐसी ही होती हैं....
Monday, May 19, 2008
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9 comments:
अति सुन्दर भावाव्यक्ति. बधाई.
बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती
सुंदर कविता , सुंदर अभिव्यक्ति ।
behad sundar
रूह तो आज तक भीगी हुई है
सच कहा.....
सुंदर !
सुंदर!
बहुत बढ़िया!
यूं तो जिस्म सूखा है पर
रूह तो आज तक भीगी हुई है.
ऐसा क्यों लग रहा है की ऐसा सबके साथ होता है?
kya baat hai. ati uttam.
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