Saturday, April 26, 2008

चाँद की बुढ़िया

देखो तो... चाँद की चरखा चलाती बुढ़िया
आज कितना सूत कात रही है
सारा आसमान भर गया है बादलों से
लगता है चाँद से कुछ कहासुनी हुई है

बिलकुल मेरी दादी की तरह है
जब भी मुंह फुलाती थी
घर का सारा काम अकेले ही कर जाती थी...

3 comments:

डॉ .अनुराग said...

again a masterpiece..jitni bar padhu achhi lagti hai.

कुश said...

खूबसूरत नज़्म

कुमार मुकुल said...

अच्‍छी लगी कविता, कल देखा कविता भी सही लगी कि बचपना ना हो तो जीवन बोझ हो जाए